सभा में बोले आचार्य - ले अंग्रेज तू हिंदुस्तानी डंडे का स्वाद चख ले

दक्षिण भारत के महान क्रांतिकारी तिरुमल आचार्य का पूरा नाम मण्डयाम पार्थसारथी - तिरुमल आचार्य था । वे एमपीटी आचार्य के नाम भी जाने जाते थे । तिरुमल जी लोकमान्य टिळक से प्रेरणा लेकर लंदन के इंडिया हॉउस पहुंचे और वहां रहते हुए स्वातंत्र्य वीर विनायक दामोदर सावरकर के साथ क्रांतिदल में सक्रिय हो गए ।

01 जुलाई 1909 को लदन के इम्पीरियल हॉल में इंडियन नेशनल एसोसिएशन के कार्यक्रम में क्रांतिवीर मदमलाल ढींगरा ने कपटी अंग्रेज अफसर कर्जन वायली का वध किया था । इस घटना की निंदा करने के लिए 9 जुलाई 1909 को लंदन के केक्सटन हॉल में आगा खां की अध्यक्षता में एक सभा आयोजित की गई , जिसमें क्रांतिवीर मदनलाल ढींगरा के कृत्य पर निंदा प्रस्ताव रखागया । 

सभा में वीर सावरकर , तिरुमल आचार्य सहित अनेक भारतीय भी उपस्थित थे । जैसे ही एक अंग्रेज ने निंदा प्रस्ताव रखा , तो योजनानुसार वीर सावरकर ने खड़े होकर इस प्रस्ताव का विरोध करते हुए कहा - ' अभी तक न्यायालय ने मदनलाल को अपराधी नहीं माना है । इस कारण निंदा प्रस्ताव पारित करना न्यायालय का अपमान करना है । उसी समय वहां उपस्थित पामर नामक एक अंग्रेज युवक ने वीर सावरकर को एक मुक्का मारकर कहा - ' लो , अंग्रेजी मुक्के का मार सहो । ' सावरकर पर प्रहार होते देख तिरुमल आचार्य से रहा नहीं गया । 

उन्होंने पामर पर एक डंडे से जोरदार प्रहार किया और कहा ' तो ले गोरे , अब हिंदुस्तानी डंडे का स्वाद चख । ' इस कोलाहल के कारण वह सभा बिना प्रस्ताव पारित किए समाप्त हो गई । त्रि इस घटना के बाद तिरुमल जी पुर्तगाल चले । त गए । लेकिन ब्रिटिश सरकार के दबाव के कारण पुर्तगाल सरकार ने उन्हें वहां से निष्कासित कर दिया । तब वे पेरिस आकर क्रांति वीरांगना मदाम कामा द्वारा निकाले जाने वाले पत्र ' वन्दे मातरम ' और ' तलवार ' के सम्पादन कार्य में जुड़ गए । वे ' बर्लिन समिति के सदस्य भी रहे थे । 

जब नेताजी सुभाषचन्द्र बोस जर्मनी गए , तो तिरुमल जी ने उनसे मिलकर भारत की स्वतंत्रता के लिए कई योजनाओं पर चर्चा की । अंग्रेज उनसे इतने भयभीत थे कि उनके भारत आने पर प्रतिबंध लग गया था । अंतत : स्वतंत्रता के बाद 1948 में ही वे भारत आ पाए ।

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