बेमेल गठबंधन सरकार से उम्मीद करना बेमानी

उत्तर भारत विशेषकर हरियाणा व पश्चिमी उत्तर प्रदेश की एक मशहूर कहावत , घर बसा नहीं , झगड़े पहले शुरू हो गए , महाराष्ट्र की बेमेल गठबंधन सरकार पर पूरी तरह फिट बैठती है । उद्धव ठाकरे के शपथ ग्रहण के साथ जो खबरें आ रही है , उन्हें देखकर तो इस सरकार का भविष्य कतई उजला नहीं कहा जा सकता । 

हालात ये हैं कि दिल्ली पहुंचकर न्योता दिए जाने के बावजूद कांग्रेस की कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गांधी शपथ ग्रहण समारोह में नहीं आई । राकांपा के अजीत पवार को उपमुख्यमंत्री बनाए जाने पर कांग्रेस को आपत्ति है । राकांपा सुप्रीमों शरद पवार किसी भी सूरत में विधानसभा अध्यक्ष और उपमुख्यमंत्री पद कांग्रेस को देने पर राजी नहीं हैं । महत्वपूर्ण मंत्रालयों को लेकर शिवसेना , कांग्रेस , राकांपा तीनों में घमासान मचा हुआ है । 

सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि शपथ ग्रहण के दिन ये हाल है तो अगले पांच साल कैसे गुजरेंगे । तय लग रहा है कि यह सरकार कुछ ही दिनों में अपने ही भार से गिर जाएगी । देश ऐसे ही प्रयोग का हश्र कर्नाटक में देख चुका है , वहां कुमारस्वामी महज 14 माह के छोटे से कार्यकाल में गठबंधन की पेचिदगियों को लेकर टीवी कैमरों के सामने रोते नजर आए । 

महाराष्ट्र में एक तरह से कर्नाटक को भी मात देने वाला बेमेल राजनीतिक प्रयोग किया गया है । कर्नाटक में भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए एक - दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़े जनता दल - एस और कांग्रेस ने हाथ मिला लिया था तो महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री की कुर्सी के लोभ में शिवसेना भाजपा से नाता तोड़कर अपने धुर विरोधी दलों कांग्रेस और राकांपा की गोद में बैठ गई है । यह मौकापरस्त राजनीति का चरम है । 

इसके बुरे नतीजे शिवसेना के साथ कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को भी भोगने होंगे । यह महाराष्ट्र की जनता द्वारा दिए गए जनादेश का भी अपमान है । प्रदेश के मतदाताओं ने 288 सदस्यों वाली विधानसभा के चनाव में भारतीय जनता पार्टी को 105 , शिवसेना को 56 , राकांपा को 54 और कांग्रेस को 44 सीटें दी थीं । भाजपा - शिवसेना और कांग्रेस - राकांपा ने गठजोड़ करके चुनाव लड़ा था । भाजपा - शिवसेना को 161 सीट के साथ स्पष्ट बहुमत मिला था , लेकिन चुनाव परिणाम आते ही 56 सीटों वाली शिवसेना ने मुख्यमंत्री पद मांगकर जनादेश को रौंद दिया और सरकार बनाने के लिए कांग्रेस - राकांपा की गोद में बैठ गई । 

हालांकि सरकार बनाने से पहले शिवसेना - एनसीपी और कांग्रेस ने आधिकारिक तौर पर अपने गठबंधन के नाम का ऐलान ' महा विकास अघाड़ी ' करते हुए कॉमन मिनिमम प्रोग्राम भी जारी कर दिया है । जिसमें किसानों , बेरोजगारों , महिलाओं , गरीबों , स्वास्थ्य और उद्योगों के लिए बड़ी बड़ी घोषणाएं की गई हैं , लेकिन सरकार गठन पर हो रही जोर आजमाइश ने इस इन घोषणाओं के पूरा होने पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है । 

जो नेता कुर्सी के लिए अपनी नीति , सिद्धांत और विचारधारा का परित्याग कर दे , उससे जनता के भले की उम्मीद करना ही बेमानी है । सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकार बनाने वाले तीनों दलों की विचारधारा में जमीन - आसमान का अंतर है । शिवसेना जहां कट्टर हिन्दूविचारधारा रखती है वहीं कांग्रेस हमेशा से ही इसका विरोध करती है । अब अगर साथ आ ही गए हैं तो कांग्रेस और राकांपा को भी कुछ कठिन सवालों से दो - चार होना होगा । 

सबसे पहला सवाल तो यही होगा कि क्या अब कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी खद को कथित तौर पर पंथनिरपेक्ष बताती रहेंगी ? क्या शिवसेना हिन्द प्रेम त्याग देगी । अगर कांग्रेस - राकांपाको शिवसेना की राजनीति रास आ गई है तो फिर उन मुद्दों का क्या होगा , जिनके आधार पर वे चुनाव मैदान में उतरे थे पर है कि यदि सत्ता के लोभ में शिवसेना ने अवसरवादी राजनीति का परिचय दिया है तो यही काम कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस ने भी किया है ।

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