ज्ञान है आत्मज्ञान , पुस्तकीय ज्ञान नहीं

गीता क्या है ? ' या भगवता गीता सा गीता । ' जो भगवान के द्वारा गायी गयी है , वही है गीता । भगवान को भगवान हम क्यों कहते हैं ? भगवान वे हैं , जिनमें भग है । भग यानी छह वस्तुओं का समाहार । ये वस्तुएं जिनमें ऐश्वर्य हैं , वीर्य हैं , यश हैं , श्री हैं , आत्मज्ञान है , वे है भगवान । और है वैराग्य । ज्ञान है आत्मज्ञान । पुस्तकीय ज्ञान नहीं । पुस्तकीय ज्ञान आज । पढ़ते हो , कल भूलते हो । वह ज्ञान , ज्ञान नहीं है । 

ठीक आज की पुस्तक में जो एक शहर का नाम है , हो सकता है कि कल उसका नाम कुछ और हो जाए या उसकी जगह राजधानी कहीं और हो जाए । तो पुस्तकीय ज्ञान चरम तथा परम नहीं है । इसलिए पुस्तकीय ज्ञान भी बाहरी ज्ञान है , वह ज्ञान नहीं है । घटना के परिवर्तन के साथ - साथ उनकी सत्यता भी नष्ट हो जाएगी । तो सही मायनों में ज्ञान क्या है ? आत्मज्ञान ही ज्ञान है , क्योंकि जहां ज्ञान क्रिया है , वहां तीन सत्ताएं रहती हैं । तीन सत्ताएं क्या हैं ? पहला ज्ञेय - जिसको तुम जान रहे हो । 

दूसरा ज्ञाता - जो जान रहा है और तीसरा है ज्ञान यानी जानना । यह रूप क्रिया है । तो ज्ञेय , ज्ञाता और ज्ञान , तीनों को लेकर ज्ञान क्रिया पूर्ण होती है । तो इसमें ज्ञेय में दोष हो सकता है , ज्ञानक्रिया में भी दोष हो सकता है और ज्ञाता में भी दोष हो सकता है । किन्तु आत्मज्ञान क्या है ? अपने को जानना , माने ये जो ज्ञेय और ज्ञाता हैं , दोनों एक हैं । अतः स्वयं को जान रहा है । इसलिए ज्ञेय और ज्ञाता में अन्तर नहीं है । ज्ञेय और ज्ञाता जब एक हो गया तो उनके बीच का अंतर और उसकी क्रियाएं भी नहीं रहतीं ।

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