फिर सक्रिय हों साहित्य अकादमी के पाठक मंच

इन दिनों मुख्यधारा में जो भी बात होती है , वह या तो राजनीति की होती है , तकनीक की होती है या फिर बढ़ते अपराध , प्रदूषण या जिंदगी की मुसीबतों की होती है । वे लोग कहां गए जो साहित्य , संस्कृति , पठन - पाठन , लेखन आदि की बातें किया करते थे ? बहरहाल , एक समय था जब मध्य प्रदेश में साहित्य अकादमी की ओर से बाकायदा पाठक मंच संचालित होते थे । इनके जरिए साहित्य के आनंद की लौ प्रज्ज्वलित रहती थी । किंतु समय की गर्द में ये धूल - धूसरित हो चले हैं । क्यों न ऐसा हो कि इन पाठक मंचों को साहित्य अकादमी पुन : सक्रिय करे ?


वस्तुत : हजारों वर्षों के इतिहास को पलटकर देखें तो हम पाएंगे कि साहित्य , कला , संस्कृति को सदा ही राजाश्रय मिलता रहा है । दरअसल , साहित्य वह विधा है जो समाज को चिंतन , विचार और दिशा देती है । हालांकि इससे सीधा आर्थिक लाभ होते हुए नहीं दिखता , लेकिन समाज में जो सामाजिक गरिमा व सम्मान का माहौल बनता है , वो किसी भी सेंसेक्स से कहीं ऊंचा और गरिमामय होता है । देश व प्रदेश में साहित्य अकादमियों की स्वायत्त स्थापनाएं इसीलिए की गई थी ताकि बिना सरकारी या राजनीतिक दबाव के कलाप्रेमी स्वतंत्र रूप से सरकार और समाज को वैचारिक दिशा दर्शन देते रहें । मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी का इतिहास तो बहुत गौरवशाली रहा है । साक्षात्कार तथा पूर्वग्रह अकादमी की पत्रिकाएं रही हैं , जिनकी साहित्यिक भूमिका बहुत उल्लेखनीय रही । विगत वर्षों में साहित्य अकादमी ने अंतरराष्ट्रीय संवाद , पुस्तक मेले , वैचारिक गोष्ठियों के आयोजन भी किए । 

किंतु इस सबमें सीधे पाठक या श्रोता से जुड़ने वाले माध्यम खत्म - से हो गए हैं । 1990 के दशक में तत्कालीन प्रदेश सरकार ने आम लोगों को साहित्य से जोड़ने के लिए मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के तत्वावधान में प्रदेशभर में पाठक मंच योजना का अभिनव प्रयोग किया था । अकादमी की प्रतिनिधि इकाई व एक सजनात्मक स्थानीय संस्था के रूप में प्रदेश के विभिन्न अंचलों में ' मानसेवी साहित्य प्रेमियों के संयोजन में ' प्रदेश में जगह - जगह ये मंच स्थापित हुए थे । 

अकादमी अच्छी पुस्तकों का चयन कर हर किताब की कुछ प्रतियां प्रत्येक पाठक मंच तक पहुंचाती थी । मानसेवी साहित्य प्रेमी उन किताबों को स्थानीय पाठकों को सुलभ करवाकर पढ़वाते व उन्हें किताब पर टिप्पणी लिखने को प्रेरित करते । फिर एक गोष्ठी का आयोजन कर किताब की चर्चा होती , समीक्षा पाठ किया जाता और अखबारों में चर्चा होती । इस तरह स्थानीय रचनाधर्मियों से लेकर आम पाठक तक को बौद्धिक पोषण और सही दृष्टिकोण मिलता । बाद में वे किताबें किसी पुस्तकालय को दे दी जातीं । 

यह एक तथ्य है कि बेहतर जीवन का रास्ता किताबों से होकर जाता है । तो क्या आज समाज में जो अपराध बढ़ रहे हैं , जो दिशाहीनता है , निश्चित ही उसके पीछे साहित्य में आई पठन - पाठन की कमी भी है ? हमें यह सुनिश्चित करना ही होगा कि हमारी वर्तमान और आगामी पीढ़ी अच्छे साहित्य को पढ़े ताकि एक अच्छे समाज का निर्माण हो । क्या सरकार अपने बहुत विशाल बजट में से बूंद भर हिस्सा पाठक मंच को पुन : शुरू करने के लिए देगी ? या फिर सड़कों , पुलों को बनाने और खदानों के आवंटनों के लिए ही सक्रिय रहेगी । वस्तुतः सरकार सक्रिय होगी तो लोक साहित्य अपने आपजीवंत हो उठेगा ।

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